बाबा गुरु घासीदास सामाजिक समरसता के अग्रदूत : सभापति जिला पंचायत मीना बंजारे
सिमगा/ छत्तीसगढ़ के महान संत बाबा गुरु घासीदास जी का जन्म बलौदाबाजार जिला के कसडोल ब्लॉक में गिरौधपुरी नामक ग्राम में दिनांक 18 दिसम्बर 1756 में हुआ था बचपन से बाबा गुरु घासीदास जी जिज्ञासु प्रवर्ती के थे हमेशा कुछ नया करना उनके स्वभाव में था । गरीब कृषक परिवार में जन्म लेने के बावजूद अपने युवा काल से प्रकृति को समझना एवं प्रकृति से मानव के समावेश को समझने के लिए अपने वैवाहिक ज़िमेदारी के बावजूद अपने ग्राम के ही पास घनघोर जंगल मे एकान्त ज़िमेदारी के बावजूद अपने ग्राम के ही पास एक घनघोर जंगल मे एकांतवास लिया जहाँ जंगल के बीच प्रकृति में स्थित एक पहाड़ में प्रकृति जंगल में अनेक प्रकार के पशु पक्षियों का वास था कभी ना डिगने वाले अपने आत्मविश्वास के दम पर लगातार एकांत वास में प्रकृति में मानव का समावेश उस सत्य को जानने पहचानने एवं समझने में कामयाब हुआ पूर्ण रूप से जीवन के सत्य को समझने से उपरांत अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा में लगाया एवं संपूर्ण मानव को सत्य की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया उन्होंने कहा इस प्रकृति में जन्म लेने वाले संपूर्ण मानव सहित संपूर्ण जीव की स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार है उन्होंने मानव समाज के लिए मानव मानव एक समान उपदेश दिया एवं प्रकृति के विरूद्ध आचरण को क्या करने को कहा वास्तव में छत्तीसगढ़ के छोटे से गाँव से लेकर अपने कर्म एवं तपोबल के आधार पर पूरे भारत मे महान संत के रूप में स्थापित हुए महा दिसम्बर का पर्व उनके उद्देश्यों का अनुसरण करने वाले अनुयाई जिन्हें सतनाम पंथ अथवा सतनामी कहा जाता है उन्हें गुरु के पर्व अनुसरण करते हुए गुरु पर्व के रूप में पूरे माह भर उनकी जयंती को मनाते है आज से समय मे बाबा गुरु घासीदास जी एक वर्ग समुदाय तक सीमित नही है प्रकृति एवं विज्ञान से जुड़े हुए किसी भी वर्ग एवं भागीदारी बनते हैं, वास्तव में बाबा गुरु घासीदास जी का करमत्व उन्हें महान संत के श्रेणी में स्थान देता है और उनका कृतित्व उन्हें सामाजिक समरसता के अग्रदूत के रूप में स्थापित करता है

















