बैमा के आ. जा. क. वि. पुर्व माध्यमिक विद्यालय जूंझ रहा अपनी जर्जर हालत से...
खड़गवां। जहां एक तरफ़ छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था को ले कर शासन प्रशासन बड़े बड़े कवायदें तो कभी बड़े बड़े वादे करती हैं, कहीं शिक्षा स्तर को बेहतर करने के तमाम योजनाओं को पारित करने की बात सामने आती हैं तो कहीं सरकार द्वारा बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ के नव पीढ़ी के लिए छत्तीसगढ़ शासन सदैव तत्पर है।एक बेहद महत्वपूर्ण गौर करने वाली बात और भी है कि, हमारे देश भारत में, 90 प्रतिशत अच्छे खासे पदों में पदस्थ उच्च अधिकारी, जो कि ताल्लुकात गांव से ही रखते हैं, ज़्यादातर देखा गया है कि छोटे से गांव में संघर्षों के कलम से ही क्रांति लिखी गई है, हिन्दुस्तान की धड़कन हिन्दुस्तान के गांवों में धड़कती देखी जा सकती है, जब छोटे छोटे गांव से संघर्ष की राह पर बिना रूके बच्चे अपना सफर तय करते नज़र आए हैं, तब जा कर सबसे ज्यादा शिक्षित एवं उच्च अधिकारी बन कर सफल हुए हैं।

उक्त विद्यालय की बच्ची ने बिना झिझक अपना परिचय दिया अंग्रेजी में!मगर ग्राम पंचायत बैमा में स्थित एक स्कूल की ज़मीनी स्तर से जुड़ी सच्चाई को देखने के बाद, मन मस्तिष्क में मानो दुख एवं पीड़ा से लिप्त भावनाएं उत्पन्न होने लगती हैं, जब एक तरफ़ ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे छोटे मासुम से बच्चों की ज़ुबान से फर्राटेदार अंग्रेजी सुनने मिले मगर दूसरी तरफ़ उनके भविष्य को मात्र एक शिक्षक के भरोसे छोड़ दिया जाए, शिक्षक मात्र एक, और बच्चे करीब 114 से 118।जब विद्यालय के अंदर जा कर वहां की कक्षाओं की स्थिति देखी गई, तब कुछ इस तरह का दृश्य सामने आया, जहां कक्षाओं में पढ़ रहे बच्चों के सर पर छतों की छड़ें नज़र आ रही थीं, दिवारों में ब्लैक बोर्ड में दरारें तो थी हीं, मगर जिस कक्षा में बैठ कर बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे वहां की छतों में बड़े बड़े दरार थे, हालत इतनी बद से बद्तर हो चली है कि उन दरारों से झांकती छड़ें, कभी भी किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता दे सकती हैं, जहां अपना जान जोखिम में डाल कर बच्चे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के सपने सजाए रहे हैं, शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।ग्राम पंचायत बैमा के विद्यालय की जर्जर हालत का ज़िम्मेदार कौन?हम बात कर रहे हैं, विधानसभा बैकुंठपुर अंतर्गत विकास खंड खड़गवां में स्थित ग्राम पंचायत बैमा की, जहां मौजूद आदिम जाति कल्याण विकास पुर्व माध्यमिक विद्यालय जिसमें शिक्षा ग्रहण करते बच्चों की संख्या क़रीब 114-118 है, मगर उन बच्चों को उचित शिक्षा देने के लिए वहां पदस्थ हैं मात्र एक प्रधान पाठक एवं एक शिक्षक, विभागीय आदेशों के अनुसार उस विद्यालय के प्रधान पाठक को वहां आस पास मौजूद अन्य विद्यालयों में मॉनिटरिंग के लिए जाना पड़ता है, वहीं बात करें वहां पदस्थ शिक्षक की, तो विद्यालय के कार्यालय से संबंधित समस्त लिखा पढ़ी कार्यों के साथ ही साथ बच्चों को शिक्षा देने का सारा जिम्मा उनके मत्थे, अब ऐसे स्थिति में दोषारोपण का जिम्मा तो वहां पदस्थ प्रधान पाठक एवं शिक्षक पर देना अनुचित ही होगा।फिर तो सवालों के घेरे में शासन प्रशासन से ले कर शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारीयों को खड़े करना क्या उचित नहीं होगा? इस अव्यवस्था के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार आखिर कौन है? बच्चों के भविष्य के साथ इस तरह का जो खिलवाड़ किया जा रहा इस लापरवाही में मुख्य रूप से दोषी अगर शासन प्रशासन और शिक्षा विभाग से संबंधित समस्त उच्च अधिकारी नहीं हैं, फिर इन सब दुखद दृश्यों के लिए किसे दोषी ठहराना उचित होगा, साथ ही साथ इस विद्यालय से जुड़ी सभी कुव्यवस्थाओं की वजह से आने वाले समय में इन बच्चों के शिक्षा में समस्त त्रुटियों के लिए जवाबदेह कौन होगा?
सम्पूर्ण मामले का विवरण कुछ इस प्रकार है:

















