बस्तर दशहरा संकट में: तिरिया पंचायत ने रथ निर्माण के लिए लकड़ी कटाई पर लगाई रोक

बस्तर दशहरा संकट में: तिरिया पंचायत ने रथ निर्माण के लिए लकड़ी कटाई पर लगाई रोक

25-Aug-2025    8:24:02 pm    44    Anita nishad

 जगदलपुर, बस्तर 

बस्तर की 600 वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत इस बार पर्यावरणीय संकट की चपेट में आ गई है। जगदलपुर के तिरिया ग्राम पंचायत ने बस्तर दशहरा के रथ निर्माण हेतु जंगल से लकड़ी कटाई पर रोक लगाकर एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाया है। यह निर्णय वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत ग्रामसभा की सहमति के अभाव में पेड़ काटे जाने पर रोक के आधार पर लिया गया है।

ग्राम पंचायत का कहना है कि दशहरा आयोजन के नाम पर हर वर्ष लगभग 70 से 80 पुराने और विशाल वृक्ष काटे जाते हैं, जिससे जंगलों की जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ रहा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि हजारों घन फीट लकड़ी की खपत तो होती है, लेकिन उसके एवज में न तो वृक्षारोपण होता है और न ही जंगलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।

इस फैसले ने दशहरा आयोजन समिति और जिला प्रशासन दोनों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “बस्तर दशहरा हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। रथ निर्माण इसकी आत्मा है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। हम प्रयास करेंगे कि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।”

गौरतलब है कि बस्तर दशहरा न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि यह क्षेत्रीय पर्यटन का भी प्रमुख आकर्षण है। हर साल देश-विदेश से हजारों पर्यटक इस भव्य आयोजन को देखने आते हैं।

इस बीच, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पंचायत के निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि परंपरा को बनाए रखते हुए रथ निर्माण में लोहे, फाइबर या अन्य पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों का प्रयोग किया जा सकता है। इससे जंगलों की रक्षा भी होगी और उत्सव की गरिमा भी बनी रहेगी।

हालांकि परंपरावादी वर्ग, विशेषकर दशहरा से जुड़े पुजारियों और ग्रामीणों का मानना है कि रथ का निर्माण केवल पवित्र जंगलों से प्राप्त लकड़ी से ही संभव है। उनका कहना है कि रथ देवी-देवताओं से जुड़ा होता है और इसमें किसी प्रकार का प्रयोग या परिवर्तन परंपरा का अपमान माना जाएगा।

फिलहाल जिला प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पंचायत, समिति और ग्रामीणों के साथ संवाद शुरू कर दिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि परंपरा और पर्यावरण के बीच कोई संतुलनकारी समाधान निकलेगा।