पाकिस्तान में भी गूंजता है जय श्रीकृष्ण! जानिए कैसे मनाई जाती है जन्माष्टमी सरहद के उस पार

पाकिस्तान में भी गूंजता है जय श्रीकृष्ण! जानिए कैसे मनाई जाती है जन्माष्टमी सरहद के उस पार

16-Aug-2025    5:51:13 pm    63    Anita nishad

 नई दिल्ली / लाहौर / कराची : जन्माष्टमी का पर्व केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देश में भी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूमधाम होती है?

जी हां, पाकिस्तान में आज भी कई श्रीकृष्ण मंदिर मौजूद हैं, और वहाँ पर भी जन्माष्टमी के दिन भक्ति, पूजा और सजावट का वही माहौल होता है जैसा भारत में देखने को मिलता है।



 रावलपिंडी का ऐतिहासिक कृष्ण मंदिर:

पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में स्थित यह मंदिर वहां का सबसे बड़ा और प्रमुख हिंदू मंदिर है। इसे वर्ष 1897 में कांची मल और उजागर मल राम पांचाल द्वारा बनवाया गया था। विभाजन के बाद यह मंदिर कुछ वर्षों तक बंद रहा, लेकिन बाद में इसे फिर से पूजा के लिए खोला गया।
1980 के दशक तक भारत के इस्लामाबाद स्थित भारतीय राजदूत भी यहां पूजा करने आया करते थे।


 पाकिस्तान में श्रीकृष्ण मंदिरों की मौजूदगी:

  • कराची – स्वामीनारायण मंदिर, जहां राधा-कृष्ण की भव्य मूर्तियाँ स्थापित हैं और जन्माष्टमी के दिन विशेष कार्यक्रम होते हैं।

  • लाहौर – यहां करीब 20 मंदिर हैं, जिनमें से केसरपुरा कृष्ण मंदिर में नियमित पूजा होती है।

  • क्वेटा – यहां ISKCON मंदिर में भक्तों की बड़ी संख्या जुटती है।

  • एबटाबाद – प्राचीन मंदिर, हालांकि वर्तमान में रख-रखाव की कमी से बंद है।

  • अमरकोट – यहां भी जन्माष्टमी विशेष आयोजन के साथ मनाई जाती है।


 दुनियाभर में फैले हैं श्रीकृष्ण के भक्त:

Krishna.com के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 56 करोड़ वैष्णव अनुयायी हैं, जो भगवान कृष्ण और विष्णु के अन्य अवतारों की पूजा करते हैं।
ISKCON (अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ) की स्थापना के बाद से अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, कनाडा, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में श्रीकृष्ण मंदिरों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

 सिडनी, न्यूयॉर्क, लंदन, मॉस्को, टोरंटो, और जोहांसबर्ग जैसे शहरों में हर साल जन्माष्टमी पर रथ यात्रा, भजन-कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विशाल प्रसाद वितरण का आयोजन होता है।

 आध्यात्मिकता की कोई सीमा नहीं होती:

श्रीकृष्ण के प्रति आस्था ने यह सिद्ध कर दिया है कि भक्ति किसी सरहद, धर्म या भाषा की मोहताज नहीं है। चाहे वो रावलपिंडी हो या न्यूयॉर्क, कृष्ण की बांसुरी हर दिल को छू जाती है।